राजा राममोहन राय पर निबंध - Raja Ram Mohan Roy Essay in Hindi

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राजा राममोहन राय पर निबंध - Raja Ram Mohan Roy Essay in Hindi
Raja Ram Mohan Roy Essay in Hindi


राजा राममोहन राय पर निबंध (Raja Ram Mohan Roy Essay in Hindi)

प्रस्तावना - 19 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में, भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में कुछ ऐसे आंदोलन शुरू हुए. जिन्होंने सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों में हो रही बुराइयों को हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त करने की कोशिश की, जिन्हें मुख्य रूप से साधारण भाषा में नवजागरण आंदोलन कहा जाता है तथा उन आंदोलनों के प्रमुख प्रतिनिधित्व कर्ता राजा राममोहन राय को कहा जाता है. 

उस समय समाज सुधारकों द्वारा एक ओर सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही रूढ़ियों को समाप्त करने के प्रयास किए जा रहे थे, जिसके कारण वहीं दूसरी ओर, भारत के गौरवशाली अतीत को प्रकट करते हुए, भारतीयों के मन में आत्म-सम्मान की भावना भी जागृत हुई. जिससे भारतीय जनता ने ब्रिटिश साम्राज्य और औपनिवेशिक संस्कृति के विस्तार के खिलाफ एक बड़ी प्रतिक्रिया दी. 

क्योंकि उस समय ब्रिटिश की शासन प्रणाली ने भारतीय समाज को काफी हद तक ज्यादा ही प्रभावित किया था जिससे भारतीय ब्रिटिश शासन प्रणाली से असंतुष्ट थे. ऐसे में राजा राममोहन राय समाज सुधारक के रूप में भारतीयों के साथ खरे उतरे और उन्होंने सामाजिक प्रथाओं और धार्मिक विश्वास के बीच गहरे संबंध होने के कारण देश में सामाजिक सुधार के लिए धार्मिक सुधार ही आवश्यक समझा. 

क्योंकि तब लोगों में सती प्रथा बहुत ही अधिक बड़ रही थी जो भारतीयों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं थी. राजा राम मोहनराय ने सती प्रथा को खत्म करने के लिए लोगों को प्रेरित किया व भारतीयों में विश्वास जताया.

राजा राममोहन राय का जीवन परिचय -

राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई सन् 1772 को बिहार, राधानगर में हुआ था. उनका बचपन का नाम राममोहन था.  उनका जन्म बंगाल के एक ब्राह्मण जमीदार परिवार में हुआ था. 19वीं सदी में सामाजिक-सुधार आंदोलन बंगाल के राजा राम मोहनराय के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ था. राजा राम मोहनराय को बंगाल में नवचेतना एवं क्रांतिकारी का अग्रदूत, भारत में नवजागरण का अग्रदूत, सुधार आंदोलन का प्रवर्तक एवं आधुनिक भारत का पहला नेता कहा गया है. 

राजा राममोहन राय को हिन्दू धर्म के मौलिक सिद्धांतों एवं दर्शन में गहरी आस्था थी. वे कालांतर में हिन्दू धर्म एवं समाज में आये आडंबरो को समाप्त करना चाहते थे. वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानव गरिमा, सामाजिक समानता आदि विचारों को अपनाकर भारत का सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीति एवं धार्मिक पुनरुस्थान करना चाहते थे. उन्होंने हिन्दू, इस्लाम, ईसाई आदि धर्मो एवं इनके महत्वपूर्ण ग्रंथों गहन अध्ययन किया. 

राजा राममोहन राय अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, लेटिन, हिब्रू आदि अन्य कई भाषाओं के जानकार थे. इन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी की किन्तु बाद में त्याग पत्र दे दिया. उन्होंने अपने विचारों के प्रचार के लिए एकेश्वरवादियाँ का उपहार (Gift to monotheist) एवं  प्रीसेप्टस आफ जीसस (precepts of Jesus) नामक पुस्तकें लिखी थी. उन्होंने तोहफल-उल-मुहीद्दीन फारसी भाषा में लिखी व इसके अलावा उन्होंने फारसी में 'मिरात उल अखबार', बांग्ला में 'संवाद कौमुदी' पत्रिका एवं हिन्दी में 'बंगदूत' जैसे टिप्पणियाँ भी लिखी है.

राजा राममोहन राय सती प्रथा, सामाजिक व धार्मिक सुधार - 

राजा राम मोहन राय ने 1814 ई को कलकत्ता में आत्मीय सभा की स्थापना की और 1825 ई में कलकत्ता में ही वेदांत काॅलेज की स्थापना की व उसके तीन साल बाद उन्होंने 1828 ई में कलकत्ता में 'ब्रह्म सभा की स्थापना कर अपने विचारों का प्रचार-प्रसार किया. जो बाद में ब्रह्म सभा से 'ब्रह्म समाज' कहलायी. राजा राम मोहनराय और उनके ब्रह्म समाज ने भारतीय समाज में समय-समय पर होने वाली कुरीतियों का विरोध किया. 

प्राचीन धार्मिक ग्रंथों के आधार पर, राजा राम मोहनराय ने यह साबित करने की कोशिश की कि कई सामाजिक रूढ़ियाँ मूल हिंदू धर्म के खिलाफ हैं. उन्होंने जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता, सती प्रथा, बहुविवाह, बाल विवाह, पुरदाह आदि का विरोध किया. उन्होंने सती प्रथा को समाप्त करने के लिए एक आंदोलन शुरू किया. उन्होंने मूल हिंदू धार्मिक ग्रंथों के आधार पर यह साबित करने की कोशिश की कि सती प्रथा को धार्मिक मान्यता नहीं थी और हिंदू समाज में इसे कभी भी प्रथा के रूप में मान्यता नहीं दी गई थी. 

राजा राम मोहनराय ने पत्र और पत्रिकाओं के माध्यम से सती प्रथा के खिलाफ एक सार्वजनिक राय तैयार की. राजा राम मोहनराय के प्रयासों के कारण, 1829 ई (धारा 17) में, ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक के समय में, सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. न्यायालयों को ऐसे मामलों में सजा के अनुसार मुकदमा चलाने और दंडित करने का आदेश दिया गया था. प्रारंभ में यह नियम केवल बंगाल के लिए था. 

लेकिन 1830 में, इसे बॉम्बे और मद्रास में भी लागू किया गया था. राजा राम मोहनराय और ब्रह्म समाज ने सामाजिक बुराइयों का विरोध किया और महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया. उन्होंने महिलाओं को आर्थिक अधिकार देने की बात कही व महिला को शिक्षित करने का प्रयास किया गया. उनके ब्रह्म समाज ने बालिका विद्यालय की नींव रखी. राजा राम मोहनराय ने एक ब्राह्मण (एकेश्वरवाद) का प्रचार किया. 

वेदों, उपनिषदों आदि के माध्यम से, उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि हिंदू धर्म के मूल धर्मग्रंथों में ब्राह्मण की बात है. उन्होंने अर्थहीन पंथिक अनुष्ठानों और पाखंड का विरोध किया. उनका मानना ​​था कि वेदांत दर्शन भी तर्क शक्ति पर आधारित है. राजा राम मोहनराय ने कहा कि यदि कोई दर्शन, परंपरा आदि तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है और वे समाज के लिए उपयोगी नहीं हैं, तो मनुष्य को उन्हें त्यागने में संकोच नहीं करना चाहिए. उन्होंने ईसाई धर्म में प्रचलित अंधविश्वासों की भी आलोचना की. 

राजा राम मोहनराय दुनिया के सभी धर्मों की मूलभूत एकता में विश्वास करते थे. इस प्रकार ब्राह्म समाज ने राजा राम मोहनराय की मूर्तिपूजा के राजतंत्र और अविश्वास की धारणा को फैलाया.

राजा राम मोहन राय द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में कार्य - 

राजा राम मोहन राय पश्चिमी शिक्षा प्रणाली और अंग्रेजी शिक्षा के हिमायती थे. उनका मानना ​​था कि आधुनिक विचार के प्रसार के लिए आधुनिक शिक्षा भी आवश्यक है. इसलिए उन्होंने कलकत्ता में एक कॉलेज और स्कूल की स्थापना करके अंग्रेजी शिक्षा को प्रोत्साहित किया. उन्होंने वेदों और उपनिषदों का बगला में अनुवाद किया और साथ ही बगला-व्याकरण का संकलन किया. उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है. इसी कारण से, उन्हें भारतीय पत्रकारिता का अग्रदूत भी कहा जाता है.

राजा राममोहन राय के राजनीतिक व उदारवादी विचार -

राजा राम मोहनराय राजनीतिक क्षेत्र में उदार विचारों के पैरोकार थे. उन्होंने भारतीयों में राजनीतिक चेतना उत्पन्न करने में योगदान दिया है. राजनीतिक विषयों पर सार्वजनिक आंदोलन शुरू करने का श्रेय राजा राम मोहनराय को ही जाता है. उन्होंने वरिष्ठ सेवाओं में भारतीयकरण, न्यायपालिका से कार्यकारी को अलग करने, जूरी द्वारा न्याय, भारतीयों और यूरोपीय लोगों के बीच न्याय की समानता का आह्वान किया. 

उन्होंने भारतीय प्रशासन में सुधार के लिए प्रयास किए. अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं में रुचि लेते हुए, उन्होंने स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए दुनिया में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन का समर्थन किया. उन्हें मुगल सम्राट अकबर द्वितीय द्वारा इंग्लैंड भेजा गया था. राजा राम मोहनराय ब्रिटिश संसद द्वारा भारतीय मामलों पर परामर्श देने वाले पहले भारतीय थे. आर्थिक क्षेत्र में, उन्होंने जनता को आर्थिक शोषण से मुक्त करने का प्रयास किया व बंगाल के जमींदारों द्वारा किसानों के शोषण का विरोध किया.

ब्रह्म समाज का पुनर्जागरण व ईसाई मिशनरियों का प्रभाव -

देवेन्द्रनाथ टैगोर (रवीन्द्रनाथ के पिता) ने राजा राम मोहनराय के विचारों से प्रभावित होकर 1839 ई में 'तत्वबोधिनी सभा' की स्थापना की और राजा राम मोहनराय के बाद 1843 ई में देवेन्द्रनाथ टैगोर ने 'ब्रह्म समाज' को फिर से पुनर्जीवित किया. केशवचंन्द्र सेन ने ब्रह्म समाज की लोकप्रियता को बढ़ाया. देवेन्द्रनाथ टैगोर ब्रह्म समाज को राजा राम मोहनराय के मार्ग पर चलाना चाहते थे. 

केशवचंन्द्र सेन ने ब्रह्म समाज में सभी धर्मों के प्रस्तावों के पाठ की अनुमति दे दी. वे सामाजिक सुधारों में अधिक रुचि लेने लगे. इस कारण दोनों में मतभेद बढ़ता गया. 1867 ई में देवेन्द्रनाथ टैगोर ने केशवचंन्द्र सेन को आचार्य के पद से हटा दिया. जिसके कारण ब्रह्म समाज दो भागों में बंट गया. देवेन्द्रनाथ टैगोर का समाज 'आदि ब्रह्म समाज' एवं केशवचंन्द्र सेन का समाज 'भारत का ब्रह्म समाज' कहलाया.

केशवचंन्द्र सेन ने बाल-विवाह का विरोध बड़ी दृढ़ता से किया, किन्तु इन्होंने अपनी 13 वर्षीय अल्पआयु बेटी का विवाह बहुत बड़ी उम्र के कूचविहार राजा से कर दिया. इस कारण उनके कुछ अनुयायी उनसे रुष्ट हो गए और 1878 ई में केशवचंन्द्र सेन के 'भारत का ब्रह्म समाज' में फूट पड़ गयी. अपने से प्रगतिशील मानने वाले लोगों ने 'भारत का ब्रह्म समाज' से पृथक होकर 'साधारण ब्रह्म समाज' की स्थापना की. 

राजा राम मोहनराय एवं ब्रह्म समाज ने सामाजिक, धार्मिक एवं शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए. किन्तु समाज सुधारक उदारवादी और मानवतावादी विचारों से प्रभावित थे. इसके मूल में, शिक्षित बुद्धिजीवी मध्यम वर्ग था. बौद्धिक भारतीयों ने देश की दुर्दशा और पिछड़ेपन के कारणों का पता लगाकर देश के उत्थान की मांग की. ब्रह्म समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन जैसे सामाजिक आंदोलनों के माध्यम से समाज और धर्म में सुधार के प्रयास किए गए. 

ब्रिटिश व्यापारियों के साथ ईसाई पादरियों और इंजीलवादियों ने 1813 ई के बाद बड़ी संख्या में भारत आना शुरू किया. ईसाई मिशनरियों ने हिंदू धर्म के लिए हिंदू धर्म की आलोचना की और भारतीयों को ईसाई बनाना शुरू कर दिया. धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए धार्मिक-सामाजिक आंदोलन आवश्यक होने लगे. भारतीय समाज में फैली बुराइयों को समाप्त करके ईसाईकरण को रोकने के प्रयास किए गए. 

यूरोपीय विद्वान विलियम जोन्स, मैक्स मूलर आदि ने भारतीय इतिहास, धर्म और साहित्य का अध्ययन किया और कहा कि प्राचीन भारतीय सभ्यता दुनिया की महानतम सभ्यताओं में से एक है. एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल ने कई प्राचीन भारतीय ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद किया. भारतीयों में अपने गौरवशाली अतीत के ज्ञान से आत्म-सम्मान और आत्म-गौरव की भावना पैदा हुई. पश्चिमी सभ्यता के प्रचार ने भारतीयों को संदिग्ध बना दिया. 

उसने पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से भारत को बचाने की कोशिश की. समाज सुधारकों ने भारतीयों को भारतीय धर्म और संस्कृति में विश्वास बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया और अतीत में आई बुराइयों और रूढ़ियों को समाप्त करने का प्रयास किया. भारत के पुनर्जागरण में पत्रिकाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अंग्रेजों ने दुर्व्यवहार की खबरें प्रकाशित करना शुरू कर दिया. समाज सुधारकों ने पत्र और पत्रिकाओं के माध्यम से समाज में जागरूकता पैदा की. 

अंग्रेजी शिक्षित मध्यम वर्ग उभरा, उन्होंने पश्चिमी समाजों के अध्ययन और वहां चल रहे सामाजिक परिवर्तन के ज्ञान के आधार पर भारतीयों में सामाजिक समानता और एकता की भावना का प्रचार किया.

निष्कर्ष - राजा राम मोहनराय और उनके ब्रह्म समाज ने हिंदू धर्म में प्रचलित रूढ़ियों को खत्म करके और हिंदू धर्म और समाज में सुधार करके एकता और समानता लाने की कोशिश की. उन्होंने राजनीतिक चेतना जगाकर राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा दिया. उन्होंने देश के एक रक्षक के रूप में ईसाइयों के प्रचार से हिंदू धर्म और समाज की रक्षा की. इस प्रकार ब्रह्म समाज ने भारतीय समाज की समस्याओं को पहली बार, भारतीयों के समक्ष बड़ी दृढ़ता के साथ प्रस्तुत किया. 

जिससे देश के आम लोगों में बौद्धिक माहौल बना. केशव चंद्र सेन के प्रयासों से ब्रह्म समाज के विचारों से प्रभावित होकर, आत्मारंग पांडुरंग ने 1867 ई में बंबई, महाराष्ट्र में प्रथाना समाज की स्थापना की. जिसमें आर जी भंडारकर और महादेव गोविंद रानाडे प्रार्थना सोसायटी के प्रमुख व्यक्ति थे. बंगाल में ब्राह्मो समाज ने समाज को बेहतर बनाने के लिए जो काम किया, वही काम महाराष्ट्र में प्रथाना समाज ने किया. हालाँकि ये सब ब्रह्म समाज की ही देन थी.


राजा राममोहन राय पर निबंध से संबंधित सवाल - Raja Ram Mohan Roy Essay FAQ in Hindi

Q.1 राजा राममोहन राय कौन थे?

Ans. राजा राममोहन राय बंगाल में जन्में, ब्रह्म समाज के संस्थापक व देश के लिए अग्रदूत थे.

Q.2 राजा राममोहन राय का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

Ans. 22 मई सन् 1772 को, बंगाल में 

Q.3 राजा राममोहन राय के बचपन का नाम क्या था?

Ans. राममोहन

Q.4 राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का निर्माता क्यों माना जाता है?

Ans. 19वीं सदी में सामाजिक-सुधार आंदोलन बंगाल के राजा राम मोहनराय के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ था. तब उन्हें भारत में नवजागरण का अग्रदूत व आधुनिक भारत का पहला नेता कहा गया था. इसलिए उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता माना जाता है.

Q.5 राजा राममोहन राय की मृत्यु कैसे हुई?

Ans. राजा राममोहन राय की मृत्यु स्टाप्लेटोन में मेनिंजाईटिस के कारण हुई थी.

Q.6 राजा राममोहन राय की मृत्यु कब और कहां हुई?

Ans. 27 सितम्बर 1833 में 61 वर्ष की उम्र में ब्रिस्टल के पास हुई थी.


मेरे प्रिय दोस्त मैं उम्मीद और आशा करता हूँ कि आपको Essay on Raja Ram Mohan Roy in Hindi, Raja Ram Mohan Roy Essay in Hindi, "राजा राममोहन राय पर निबंध" का लेख पसंद आया होगा यदि आपको यह लेख पसंद आये तो अपने दोस्तों में जरूर शेयर करना क्योंकि हम आपके लिए हर रोज हमेशा ऐसे ही informational निबंध व भाषण की जानकारी लाते रहते है.


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