राव चंद्रसेन का इतिहास और जीवन परिचय - Rao Chandrasen History and Biography in Hindi

नमस्कार दोस्तों स्वागत आपका आज की इस ऐतिहासिक जानकारी में दोस्तों आज हम मारवाड़ के वीर योद्धा राव चंद्रसेन का इतिहास और जीवन परिचय जानने वाले है जो कि मारवाड़ के सबसे महान महापुरुषों में एक थे. जिन्हें महाराणा प्रताप अग्रगामी भी कहा जाता है.


राव चंद्रसेन का जीवन परिचय - Rao chandrasen biography in Hindi

नाम: राव चंद्रसेन

उपनाम: मारवाड़ का प्रताप, भूला बिसरा राजा 

जन्म: 30 जुलाई 1541ई. जोधपुर, राजस्थान

पिता: राव मालवदेव

माता: रानी जाली स्वरूप देवी

दादा: राव गांगाभाई

भाई: रामसिंह, उदय सिंह और रायमल

विवाह: 23 मार्च, 1560ई.

पत्नी: बाईजीलाल सूरजदे

मृत्यु: 11 जनवरी 1581ई.


राव चंद्रसेन का जन्म 30 जुलाई 1541 ई को जोधपुर में हुआ था. उनके पिता का नाम राव मालवदेव था. राव मालवदेव के कुल छह पुत्र थे जिनमें राव चंद्रसेन सबसे छोटे थे. राव मालवदेव के समय 1544 ई. में दिल्ली के शासक शेर शाह सूरी ने मारवाड़ पर आक्रमण किया, दोनों राजाओं के मध्य घमासान युद्ध हुआ जिसमें शेर शाह सूरी छल-कपट के सहारे युद्ध जीत गया परंतु राव मालवदेव के पराक्रमी सेनापतियों जैता और कूपा ने इस युद्ध के दौरान शेर शाह सूरी को कड़ी टक्कर दी.

इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार शेर शाह सूरी सफलता के लिए अल्लाह से दुआ माँगने लगा था इसी से शेर शाह सूरी के भय का पता उसकी स्वीकारोक्ति से चलता है. राजा राव मालवदेव अपने ज्येष्ठ पुत्र राम से अप्रसन्न थे, जबकि उससे छोटे बेटे उदय सिंह को पटरानी स्वरूप (चन्द्रसेन की माता) द्वारा राज्याधिकार से वंचित किया गया था, इस कारण मालवदेव की मृत्यु के बाद 1562 ई में राव चंद्रसेन को जोधपुर की राजगद्दी पर बैठाया गाया था. उस समय राव चंद्रसेन को बीसलपुर और सिवानी की जागीर मिली थी.


राव चंद्रसेन का इतिहास | Rao chandrasen in Hindi

1562 ई. में शासक बनने के कुछ ही समय बाद, राव चंद्रसेन ने गुस्से में आकर अपने एक चाकर को मार दिया. इससे जीतमल और उनके साथ पत्राचार करने वाले कुछ अन्य सरदार नाराज हो गए. नाराज सरदारों ने चंद्रसेन के भाइयों राम सिंह, उदय सिंह और रायमल के साथ गठबंधन कर चंद्रसेन पर हमला करने के लिए आमंत्रित किया. राम ने सोजत और रायमल ने दूनाड़ा प्रांत में अशांति शुरू की और उदय सिंह ने गंगानी और बावड़ी पर कब्जा कर लिया. 

सूचना मिलने पर, चंद्रसेन ने इन उपद्रवों को शांत करने के लिए अपनी सेना भेजी, ताकि रामसिंह और रायमल अपने-अपने जागीर में लौट आए, लेकिन उदय सिंह ने लोहावट नामक जगह पर राव चंद्रसेन के खिलाफ युद्ध किया जिसमें राव चंद्रसेन विजयी रहे और उदय सिंह इस युद्ध में घायल हो गए. बाद में इस युद्ध को 'लोहावट का युद्ध' कहा गया था. 1563 ई में राव चंद्रसेन और उदय सिंह के बीच नाडोल नामक स्थान पर पुनः युद्ध हुआ लेकिन फिर भी उदय सिंह को असफलता ही हाथ लगी. 

राव चंद्रसेन से दो बार युद्ध हारने के बाद उदय सिंह सम्राट अकबर के पास गए. राव चंद्रसेन के नाराज भाइयों रामसिंह, उदय सिंह व रायमल के साथ आपसी कलह के कारण अकबर को जोधपुर पर हस्तक्षेप करने का मौका मिला. उन्होंने जल्द ही हुसैनकुली खान के नेतृत्व में एक सेना भेजी, जिसने जोधपुर पर कब्जा कर लिया. जोधपुर की प्रसिद्धि में, यह कहा जाता है कि मुगल अभियान को बढ़ाते हुए, शाही सेना ने जोधपुर पर तीन बार हमला किया और लगभग दस महीने के घेरे के बाद चंद्रसेन को भोजन और पानी की कमी के कारण गढ़ छोड़ना पड़ा और भाद्राजूण जाना पड़ा.

जोधपुर छोड़ने के बाद, चंद्रसेन की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी तब वह अपने रत्न आदि बेचकर खर्च चलाने लगे. पं. विश्वेश्वरनाथ रेऊ ने अकबर द्वारा जोधपुर पर आक्रमण का प्रमुख कारण जोधपुर के राव मालवदेव द्वारा उसके पिता हुमायूं के प्रति किए गए असहयोग को माना है. 1570 ई में अकबर अपनी यात्रा के समय मारवाड़ क्षेत्र में दुष्काल की खबरें सुनकर नागौर पहुँचे. इस अवसर पर अकबर ने अपने सैनिकों से दुष्काल निवारण के लिए एक तालाब खुदवाया. जो "शुक्र तालाब" नाम से प्रसिद्ध है. वास्तव में इस दरबार का उद्देश्य मारवाड़ की राजनीतिक स्थिति का अध्ययन करना था.


चंद्रसेन के खिलाफ मुगल अभियान 

नागौर दरबार के कुछ समय बाद मुगल सेना ने भाद्राजूण पर आक्रमण कर दिया जहाँ राव चंद्रसेन प्रवासी थे. इस आक्रमण के दौरान राव चंद्रसेन भाद्राजूण का परित्याग कर शिवाणा की तरफ चले गए. 1572 ई में एक तरफ जहां गुजरात में विद्रोह फैला हुआ था वही पर दूसरी तरफ महाराणा प्रताप के शासक बनने पर मेवाड़ में भी आक्रमण होने का खतरा पैदा हो गया. इसी स्थिति में अकबर ने बीकानेर के रायसिंह को जोधपुर का शासक बनाकर गुजरात की तरफ भेजा ताकि महाराणा प्रताप गुजरात के मार्ग को रोककर क्षति न पहुचा सके. 

1573 ई में अकबर ने चंद्रसेन को अपने अधीन करने के लिए जगतसिंह, केशवदास मेड़तिया, बीकानेर के रायसिंह आदि को शाहकुली खान के साथ भेजा. यह सेना सोजत में चंद्रसेन के भतीजे कल्ला को हराते हुए शिवाणा पहुँची. अपने सेनापतियों की सलाह के अनुसार, चंद्रसेन राठौड़ को किले की रक्षा सौंपते हुए पहाड़ों पर गए और वहां से उन्होंने किले को घेरने वाली मुगल सेना के पगान पर हमला करना किया और उन्हें क्षति पहुँचाने लगे. पत्ता राठौर और चंद्रसेन के संयुक्त सफल प्रतिरोध के कारण, रायसिंह ने अकबर से अतिरिक्त सैन्य समर्थन की मांग की

इस दौरान अकबर द्वारा एक बड़ी सेना भेजने पर, चंद्रसेन पहाड़ों में चले गए. यद्यपि मुगल सेना ने उसका पीछा किया, लेकिन वह सेना चंद्रसेन को पकड़ने में विफल रही. इस असफलता से निराश होकर अकबर ने अपने अमीरों को फटकार लगाई. चंद्रसेन को अपने अधीन करने के लिए अकबर ने 1575 ई को जलाल खान के नेतृत्व में सैयद अहमद, सैयद हाशिम, शिमाल खां आदि सहित सिवाना की ओर एक बड़ी सेना भेजी. लंबे संघर्ष के दौरान एक दिन, चंद्रसेन ने अपने सहयोगी देवीदास के साथ, मुगल सेना पर आक्रमण कर दिया

इस आक्रमण में जलाल खान मारा गया. इस घटना ने शाही सेना की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचाया. इसके बाद अकबर ने फिर शाहबाज खां को भेजा. उसने शीघ्र ही देवकोर और दूनाडा पर कब्जा करके सिवाना को घेर लिया. भोजन समाप्त होते ही सिवाना किले के पहरेदारों को किला छोड़ना पड़ा. इस प्रकार 1575 ईस्वी में सिवाना के किले पर अकबर का अधिकार हो गया. 'संकटकालीन राजधानी' सिवाना हाथ से निकल जाने के बाद अक्टूबर 1575 ई को जैसलमेर के रावल हरराय ने पोकरण पर आक्रमण किया. इस समय पोकरण में राव चंद्रसेन की ओर से आनंदराम पंचोली की किलेबंदी की गई थी.

चार महीने की घेराबंदी के बाद, रावल हरराय ने चंद्रसेन के सामने प्रस्ताव रखा कि मुझे एक लाख फदियें के बदले में पोकरण दे दो, जोधपुर पर कब्जा करने के बाद एक लाख फदियें लौटाकर पोकरण मुझसे वापिस ले लेना. लुप्तप्राय आर्थिक स्थिति के कारण, चंद्रसेन ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और जनवरी 1576 ई में पोकरण भाटियों को दे दिया. पोकरण अंतिम आश्रय स्थल हाथ से निकलने के बाद भी राव चन्द्रसेन हताश नहीं हुए. करीब डेढ़ साल तक सिरोही, डूंगरपुर और बांसवाड़ा में रहने के बाद, 1579 ई. में चंद्रसेन ने सरवाड़ के मुगल थाने को लूट लिया और इसे अपने कब्जे में ले लिया. 

इसके बाद, उन्होंने अजमेर प्रांत पर भी छापा मारना शुरू कर दिया. यह समाचार मिलने पर बादशाह अकबर ने पायंदा मोहम्मद खान के नेतृत्व में एक सेना भेजी. 1580 ई में राव चंद्रसेन ने इस सेना का सामना किया पर वह असफल रहे और उन्हें फिर से पहाड़ियों पर लौटना पड़ा. कुछ दिनों बाद चंद्रसेन ने सेना को पुनर्गठित किया और 7 जुलाई 1580 ई को सोजत पर हमला किया. सोजत पर अधिकार करके, उसने सारण के पहाड़ों में अपना निवास स्थापित किया. 11 जनवरी 1581 ई को वही पर उनकी मृत्यु हो गई. जोधपुर राज्य की प्रसिद्धि के अनुसार, चंद्रसेन के एक सामंती वरसल ने धोखा दिया और भोजन को विषाक्त कर दे दिया जिससे उनकी मृत्यु हो गई.


राव चंद्रसेन और महाराणा प्रताप का इतिहास | Rao chandrasen and maharana pratap history in hindi

राव चंद्रसेन अकबर युग में राजस्थान के पहले स्वतंत्र प्रकृति शासक थे. उनके भाई सत्ता का आनंद लेना चाहते थे. लेकिन उन्होंने रत्न और आभूषण बेचकर गुजारा किया. जोधपुर राज्य को छोड़कर, चंद्रसेन ने दिन-रात पहाड़ों में घूमना और मुगल सेना से लड़ना स्वीकार किया, लेकिन अधीनता स्वीकार नहीं की. चंद्रसेन ने जो संघर्ष शुरू किया था, उसका अनुसरण करके महाराणा प्रताप ने एक बड़ा नाम कमाया. इसी कारण से, चंद्रसेन को 'प्रताप का अग्रगामी' और 'मारवाड़ के प्रताप' के रूप में भी जाना जाता है.

इतिहास में उचित महत्व न होने के कारण, चंद्रसेन को 'मारवाड़ का भूला बिसरा' नायक कहा जाता है. इतिहास में चंद्रसेन के नाम को भूल जाने का मुख्य कारण यह है कि एक ओर जहां प्रताप की मृत्यु के बाद, मेवाड़ का साम्राज्य उसके पुत्र-पौत्रादि के हाथों में रहा, वहीं चंद्रसेन की मृत्यु के बाद, मारवाड़ का सिंहासन पर उनके भाई उदय सिंह का अधिकार हो गया. क्योंकि चंद्रसेन और उदय सिंह के बीच हमेशा से ही विरोध चलता आया था.

राव चंद्रसेन और महाराणा प्रताप - राव चंद्रसेन और महाराणा प्रताप दोनों मुगल सम्राट अकबर के साथ आजीवन संघर्ष के लिए प्रसिद्ध हैं। उसके बारे में कहा जाता था कि -

अणदगिया तुरी ऊजला असमर, चाकर रहण न डिगियो चीत। 

सारे हिन्दुस्तान तणै सिर पातल नै चन्द्रसेण प्रवीत ।।

(उस समय, महाराणा प्रताप और राव चंद्रसेन भारत में केवल दो नायक थे, जिन्होंने न तो अकबर की अधीनता स्वीकार की और न ही अपने घोड़ों पर शाही दाग ​​लगने दिया और जिनके हथियार हमेशा ही मुगल सम्राट के खिलाफ चमकते थे।)

चंद्रसेन और प्रताप दोनों को अपने भाइयों-बंधुओं के विरोध का सामना करना पड़ा. प्रताप की तरह, चंद्रसेन के अधिकार में मारवाड़ के कई हिस्से नहीं थे. मारवाड़ के मांडलगढ़, मेड़ता, नागौर, अजमेर और चित्तौड़ आदि पर मुगलों का अधिकार था. समानता के साथ दो शासकों की गतिविधियों में एक बुनियादी अंतर भी है.

दोनों शासकों ने अपने पर्वतीय क्षेत्रों में रहकर मुगलों को धोखा दिया, लेकिन प्रताप के सामने चंद्रसेन चावंड जैसी कोई स्थायी राजधानी नहीं बसा सके. विशेष अवसर पर, चंद्रसेन ने अपनी मौजूदगी और मुगल सेना के विकेंद्रीकरण से प्रताप की मदद की.


Rao Chandrasen History and Biography FAQ in Hindi

Q.1 राव चंद्रसेन कौन थे?

Ans. राव चंद्रसेन जोधपुर के राजा मालवदेव के छठे पुत्र थे जो 1562 ई में जोधपुर की राजगद्दी पर बैठे थे.

Q.2 राव चंद्रसेन का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

Ans. राव चंद्रसेन का जन्म 30 जुलाई 1541 ई को जोधपुर, राजस्थान में हुआ था. 

Q.3 राव चंद्रसेन के माता-पिता का नाम क्या था?

Ans. राव चंद्रसेन के पिताजी का नाम राव मालदेव था और माता का नाम रानी जाली स्वरूप देवी था.

Q.4 मालदेव के बाद मारवाड़ का शासक कौन बना?

Ans. मालवदेव की मृत्यु के बाद 1562 ई में राव चंद्रसेन को मारवाड़ साम्राज्य का राजा घोषित किया गया था. जिसमें उन्हें बीसलपुर और सिवानी नगरों की जागीर मिली थी.

Q.5 राव चंद्रसेन की पत्नी नाम क्या था?

Ans. बाईजीलाल सूरजदे.

Q.6 राव चंद्रसेन की कुल कितने रानियाँ थी?

Ans. राव चंद्रसेन की कुल 11 रानियाँ थी.

Q.7 राव चंद्रसेन के कितने पुत्र थे?

Ans. राव चंद्रसेन के 3 पुत्र थे.

Q.8 राव चंद्रसेन को मारवाड़ का प्रताप किसने कहा?

Ans. इतिहासकारों ने.

Q.9 मारवाड़ का प्रताप और भूला बिसरा राजा किसे कहा जाता है?

Ans. राव चंद्रसेन को मारवाड़ का प्रताप और भूला बिसरा राजा कहा जाता है.

Q.10 राव चंद्रसेन की तुलना प्रताप से किसने की?

Ans. इतिहासकारों ने.

Q.11 महाराणा प्रताप का अग्रगामी किसे कहा जाता है?

Ans. राव चंद्रसेन को महाराणा प्रताप का अग्रगामी कहा जाता है.

Q.12 राव चंद्रसेन को प्रताप का अग्रगामी क्यों कहा जाता है?

Ans. राव चंद्रसेन ने अपना आजीवन पहाड़ों और मुगल के अत्याचार में बिताया था. उसी राह पर चलकर महाराणा प्रताप ने भी वही रणनीति अपनायी और मुगलो के खिलाफ अपनी तलवार चलाईं इसी कारण राव चंद्रसेन को 'प्रताप अग्रदूत' और 'प्रताप का अग्रगामी' कहा जाता है.

Q.13 राव चंद्रसेन की मृत्यु कब, कहाँ और कैसे हुई?

Ans. राव चंद्रसेन की मृत्यु सारण के पहाड़ों में 11 जनवरी 1581 ई को हुई थी. उनकी मृत्यु एक सामंती वरसल के द्वारा धोखे से भोजन में मिलाए हुए जहर से हुई थी.


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