महाराणा प्रताप का इतिहास व जीवन परिचय - Maharana Pratap History & Biography in Hindi

महाराणा प्रताप हिस्ट्री एण्ड बायोग्राफी इन हिंदी - नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका आज की इस इतिहास व जीवन परिचय की रोचक जानकारी में, दोस्तों आज हम यहाँ आपको इस पृष्ठ पर History & Biography of Maharana Pratap in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास और जीवन परिचय बता रहे है. यदि आप महाराणा प्रताप का जीवन परिचय और इतिहास जानना चाहते हैं तो आप हमारे साथ अंत तक बनें रहिए क्योंकि दोस्तों आज हम महाराणा प्रताप का संपूर्ण जीवन वृतांत, महाराणा प्रताप का इतिहास, महाराणा प्रताप हल्दीघाटी का युद्ध, महाराणा प्रताप की सच्ची कहानी, महाराणा प्रताप का चित्तौड़गढ़ व मेवाड़ का इतिहास, जीवन परिचय, जीवनी व उनकी अमर कथा आदि जानने वाले हैं तो चलीए इसी के साथ आगे बढ़ते है और शुरू करते है.

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महाराणा प्रताप का इतिहास व जीवन परिचय - Maharana Pratap History & Biography in Hindi
Maharana Pratap History & Biography in Hindi


महाराणा प्रताप का ऐतिहासिक परिचय - Maharana Pratap History & Biography in Hindi

नाम: महाराणा प्रताप (Maharana Pratap)

पूरा नाम: महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया

जन्म: 9 मई 1540 ई, विक्रम संवत् 1597

जन्म स्थान: कुम्भल गढ़ मेवाड़, राजस्थान

राष्ट्रीयता: भारतीय (Indian)

धर्म: हिन्दू, सनातन धर्म

राजवंश: मेवाड़ का सिसोदिया राजवंश

गुरु (शिक्षक): श्री आचार्य राघवेंद्र

पिता का नाम: महाराणा उदयसिंह

माता का नाम: महाराणी जयवंताबाई

रानियाँ: रत्नावती बाई परमार समेत कुल 11 पत्नियाँ

पुत्र: ग्यारह रानियों के कुल 17 पुत्र हुए

राज्य का नाम: मेवाड़ (चित्तौड़गढ़)

घोड़े का नाम: चेतक (Chetak)

राज्याभिषेक: 28 फरवरी 1572 गोगुन्दा व कुुंभलगढ़़ दुुर्ग में 

मृत्यु (died): 19 जनवरी 1597


महाराणा प्रताप का जीवन परिचय - Maharana Pratap Biography in Hindi

महाराणा प्रताप एक ऐसे महान योद्धा व पराक्रमी शासक थे जिनके चर्चे आपने जरूर सुने होंगे. महाराणा प्रताप मेवाड़ के सबसे शक्तिशाली राजा थे. जो उदयपुर (मेवाड) में सिसोदिया राजपूत राजवंश के शासक हुए थे. वीर योद्धा महाराणा प्रताप का पूरा नाम "महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया" है. उन्होंने अपने जीवनकाल में लम्बे समय तक युद्ध किया और कई बार उन युद्धों में मुगल सेना से पराजित भी हुए लेकिन कभी हार नहीं मानी. उन्होंने जंगलों में रहना पसंद किया और घास फूँस खाकर अपना पेट भरा पर मुग़ल बादशाह अकबर की अधिनता (गुलामी) स्वीकार नहीं की.

महाराणा प्रताप की गिनती भारत के उन शक्तिशाली व महान सूरवीरों से की जाती है जिन्होंने अपने राज्य व देश की प्रजा के लिए आँन, भाँन, शाँन सब कुछ छोड़ दिया और रक्षा के लिए हमेशा तलवार की धार पर खड़े रहे. महाराणा प्रताप देशभक्ति व वीरता से भरी मेवाड़ धरा की आन है. जो स्वतन्त्रता प्रेमी एवं महानायक महाराणा प्रताप की जन्म सिद्ध भूमि रही हैं. जहां कई संतो ने देश में जन जन की जड़ता को दूर करने के लिए मानवता में धर्म की अलख जगाई. महाराणा प्रताप भी उन्हीं सज्जन सूरवीरो में से एक थे जिन्होंने अपनी काया का मोह त्यागते हुए अकबर के खिलाफ युद्ध में अपना योगदान दिया.


महाराणा प्रताप की आयु, ऊंचाई, लम्बाई वजन आदि (Maharana Pratap birthday, born, height, weight, age and Weapons)

  • आयु (Age): 57 वर्ष
  • जन्मदिन: 9 मई 1540ई
  • देश: भारत (India)
  • वजन (weight):  115 Kilograms
  • ऊँचाई व लम्बाई: Height 7 फीट 5 इंच
  • कवच का वजन: 72 Kilograms
  • भाले का वजन: Bhala Weight 81 Kg.
  • तलवारों का वजन: 50 Kilograms
  • जूतों का वजन: 10 Kilograms
  • कुल वजन: 260 Kilograms


महाराणा प्रताप की जीवनी - शिरोमणि महाराणा प्रताप 1540 ई से 1597 ई के सिसोदिया राजपूत राजवंश के शासक थे. महाराणा प्रताप का जन्म मई 9, 1540ई को राजस्थान में मेवाड़ के कुम्भलगढ़ किले में हुआ था. महाराणा प्रताप के पिताजी का नाम महाराणा उदयसिंह था व उनकी माता का नाम महाराणी जयवन्ताबाई था. महाराणा प्रताप के जन्मस्थान को लेकर दो धारणाएँ विख्यात है. पहली महान लेखक "जेम्स टॉड" के अनुसार राणा प्रताप का जन्म राजस्थान के कुम्भलगढ़ दुर्ग में महाराणा उदयसिंह और माता रानी जयवंताबाई के घर हुआ था. 

क्योंकि महाराणा उदयसिंह और रानी जयवंताबाई का विवाह रश्म कुंभलगढ़ दुर्ग के महल में हुआ था. दूसरी लेखक विजय नाहर के अनुसार राजपूत राजवंश की परंपराओं व महाराणा प्रताप की जन्म कुण्डली की कालगणना के अंतर्गत महाराणा प्रताप का जन्म राजस्थान में पाली जिले के महलों में हुआ था. क्योंकि महाराणा की माता रानी जयवंताबाई पाली के सोनगरा अखैराज की पुत्री थी. जहां महाराणा प्रताप का बचपन भील समुदायों के साथ-साथ बिता और भीलों के साथ ही उन्होंने युद्ध कला भी सीखी थी. 

भील अपने संतान को शिशु अवस्था में कीका कहकर संबोधित करते थे. इसलिए उन्होंने महाराणा प्रताप को भी कीका नाम दिया था. महाराणा प्रताप की दो बहने और दो भाई थे. इसके अलावा राणा उदय सिंह की दूसरी पत्नी धीरबाई का पुत्र था जिसे रानी धीरबाई उसको राजा के रूप में उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी. जिसका नाम जगमाल था. लेकिन महाराणा उदय सिंह मेवाड़ (चित्तोड़) का उत्तराधिकारी महाराणा प्रताप को बनाना चाहते थे. जिसकी खबर मिलने पर कुँवर जगमाल बादशाह अकबर के दरबार में जाकर महाराणा प्रताप के विरोधी बन गए.

वही दूसरी और 28 फरवरी, 1572 को गोगुन्दा में महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक हुआ पर समय व विधि का विधान सही नहीं होने की वजह से 1572 में ही महाराणा प्रताप का फिर से कुुंभलगढ़़ दुुर्ग में राज्याभिषेक किया गया था. जहां जोधपुर में राठौड़ वंशीय शासक राव चन्द्रसेेन भी मौजूद थे. महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे महत्वपूर्ण व जरूरी तथ्य यह है कि मुगल बादशाह सम्राट अकबर मेवाड़ के वीर योद्धा महाराणा प्रताप को अपने अधीन लाना चाहते थे जिसके लिए अकबर ने महाराणा प्रताप को अधीनता स्वीकार कराने के लिए चार प्रमुख राजदूतों को नियुक्त किया था.

जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. को जलाल खाँ को और उसी के साथ 1573 ई. में राजा मानसिंह को, सितम्बर 1573 ई. में भगवानदास को और दिसम्बर, 1573 ई. में राजा टोडरमल को भेजा था. लेकिन वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने किसी नहीं सुनी और सबको वापस निराश ही भेजा, इसी तरह हमेशा महाराणा प्रताप मुगलों की अधीनता को नकारते जिसके परिणामस्वरूप "हल्दी घाटी" का सबसे बड़ा ऐतिहासिक युद्ध हुआ. महाराणा प्रताप ने अपने संपूर्ण जीवनकाल में कुल ग्यारह रानियों से विवाह किया था.


महाराणा प्रताप की रानियों व उनके पुत्रों के नाम (Maharana Pratap Wife's and children name)

रत्नावती बाई परमार: 

संतान - माल, क्लिंगु और गज

महारानी अजबदे पंवार: 

संतान - भगवानदास और अमरसिंह

चंपाबाई जंथी: 

संतान - सनवालदास, कल्ला और दुर्जन सिंह

अलमदेबाई चौहान: 

संतान - जसवंत सिंह

खीचर आशाबाई: 

संतान - राम सिंह और हत्थी

फूलबाई राठौर: 

संतान - शिखा और चंदा

लखाबाई: 

संतान - रायभाना

सोलनखिनीपुर बाई: 

संतान - गोपाल, साशा

जसोबाई चौहान: 

संतान - कल्याणदास

अमरबाई राठौर: 

संतान - नत्था

शहमति बाई हाडा: 

संतान - पुरा


महाराणा प्रताप का इतिहास चित्तौड़गढ़ - Maharana Pratap History in Hindi

ऐतिहासिक पन्नों में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप व उनके स्वामिभक्त अश्व चेतक का इतिहास वीरता के प्रतीक है. उन्होंने अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता व रक्षा के लिए अपना संपूर्ण जीवन बलिदान कर दिया पर कभी किसी के सामने अपना शीश नहीं झुकाया. इतिहास में उनका नाम हमेशा वीरता, त्याग, शौर्य, पराक्रम और कठोर प्रण के लिये प्रसिद्ध है. उन्होंने मुगल बादशाह सम्राट अकबर से युद्ध कर अपने राज्य की रक्षा की लेकिन अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और कई वर्षों तक उनसे संघर्ष किया. उनका मेवाड़ वीरता, मातृभूमि का प्रेम व अडिगता का परिवेश है.

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने कईं बार मुगलों को युद्ध में हराया और समस्त मुगल साम्राज्य को घुटनो बल पर ला दिया. महाराणा प्रताप के भय से मुगल बादशाह अकबर अपनी राजधानी छोड़कर लाहौर लेकर चले गए थे और महाराणा प्रताप के देहांत के बाद वापस आगरा आए थे. महाराणा प्रताप एक सच्चे राजपूत, देशभक्त, शूरवीर, योद्धा और मातृभूमि के रखवाले थे. जो दुनिया में सदा-सदा के लिए अमर हो गए. इसी से यह सिद्ध होता है कि महाराणा प्रताप कितने शक्तिशाली व सूरवीर शासक हुए थे. जिन्होंने अपनी प्रजा के लिए कड़ा संघर्ष किया पर अपराज स्वीकार नहीं की.

महाराणा प्रताप के राजा बनने से पूर्व 23 अक्टूबर 1567 को मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह के समय अकबर ने चित्तौड़ किले पर आक्रमण किया था. जिसमें उदय सिंह के कमांडरों जयमल और पट्टा ने लंबे समय तक इस आक्रमण से किले की रक्षा के लिए सफल प्रतिरोध किया, जो लगभग चार महीनों तक चला जिससे किले में बंदी लोगों को कठिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा था. लेकिन चार महीने की छापेमारी के बाद, मुगल सेना बारूद की मदद से किले की दीवार को तोड़ने में सफल हो गई. इस युद्ध में अकबर को एक बंदूक की गोली के घाव के बावजूद, 

जयमल ने अपने कुटुम्बी कल्ला के कंधे पर बैठकर दुश्मन पर गहरा वार किया. लेकिन बादशाह अकबर इस युद्ध को जीतनें में सफल रहा. जयमल और पट्टा की मृत्यु के बाद बादशाह अकबर ने 25 फरवरी 1568 को चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया. इस संबंध में एक कहावत भी प्रचलित है -

न भूख, न मेट, न मेट।

राजवत भूख अजीब, मर मिट्स चित्तौड़।

इन दोनों योद्धाओं की वीरता से अकबर इतना मुग्ध हो गया कि उसने आगरा किले के प्रवेश द्वार पर उनकी ग़ज़ल की मूर्तियाँ स्थापित करवाई, जिसका उल्लेख फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने अपने यात्रा वृत्तांत के दौरान 'मुग़ल साम्राज्य की यात्रा' में किया था. बाद में धर्मधरा औरंगज़ेब के समय, उन मूर्तियाँ को समय के कारण हटा दिया गया था.


Maharana Pratap History in Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास 

Maharana Pratap Ka Itihaas - महाराणा प्रताप का जन्म विक्रम संवत 1597 को ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया (9 मई, 1540 ई) में कुम्भलगढ़ के दुर्ग में हुआ था. वह मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह के पहले पुत्र थे और उनकी माता का नाम जयवंता बाई (जीव कंवर या जयवंती बाई) था. लेकिन राजा उदय सिंह की एक और रानी थी धीरबाई जिनका नाम इतिहास में रानी भटियाणी है. धीरबाई मेवाड़ के सिंहासन पर अपने पुत्र जगमाल को बैठाने के लिए महाराणा उदय सिंह को मनाने में असफल रही. जिसके चलते उदय सिंह की मृत्यु के बाद जगमाल ने खुद को मेवाड़ का महाराणा घोषित किया. 

महाराणा प्रताप का इतिहास व जीवन परिचय - Maharana Pratap History & Biography in Hindi
महाराणा प्रताप का इतिहास

लेकिन सामंतों ने महाराणा प्रताप का समर्थन किया और उन्हें मेवाड़ के सिंहासन पर बिठाया. इस प्रकार होली के दिन 28 फरवरी 1572 ई को महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक हुआ. महाराणा प्रताप के राज्याभिषेक के दौरान मेवाड़ के हालात काफी ज्यादा खराब थे. क्योंकि मुगलों के साथ लंबे समय से चल रहे युद्धों के कारण मेवाड़ की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था गड़बड़ा गई थी. जिसके कारण मेवाड़ के अधिकांश क्षेत्रों जिनमें चित्तौड़ भी शामिल था, सब पर मुगलों द्वारा कब्जा कर लिया गया था और मुगल बादशाह अकबर भी मेवाड़ के शेष बचे क्षेत्रों पर नियंत्रण रखना चाहता था. 

उस समय चित्तौड़ के विध्वंस और उसकी खराब स्थिति को देखकर, कवियों ने उसे 'बिना आभूषण के विधवा महिला' का उदाहरण दिया था. महाराणा प्रताप के शासक बनने पर आमेर, बीकानेर और जैसलमेर जैसी रियासतों ने कभी अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं किया और उन्होंने माता की स्वतंत्रता को महत्व देते हुए अपने कबीले की प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष का रास्ता चुना. जिससे मेवाड़ पर मुगल आक्रमण के साथ ही अन्य झगड़ों में महाराणा प्रताप का साहस कम होने लगा. ऐसी स्थिति में, महाराणा प्रताप ने सभी सांपों को इकट्ठा किया और उन्हें रघुकुल की गरिमा की रक्षा करने व

मेवाड़ को पूरी तरह से स्वतंत्र बनाने का आश्वासन दिया और कहा कि जब तक मैं मेवाड़ को मुक्त नहीं कराऊँगा तब तक मैं राज महलों में नहीं रहेगा. और मैं पंच धातु (सोना, चांदी का तला और पीतल, कांसे) के बर्तन में खाना नहीं खाऊंगा. महाराणा प्रताप ने विश्वास के साथ, मेवाड़ के वफादार भक्तों और भीलों की मदद से, एक शक्तिशाली सेना का आयोजन किया और मुगलों से दूर रहने के लिए अपनी राजधानी गोगुन्दा से कुंभलगढ़ स्थानांतरित कर दी. वही दूसरी और अकबर ने मेवाड़ राज्य में अपनी सत्ता के खिलाफ महाराणा प्रताप द्वारा किए जा रहे प्रयासों के बारे में जानकारी प्राप्त करना शुरू कर दिया था, 

इसलिए अकबर ने महाराणा प्रताप के अधीन होने के वर्ष से ही राणा प्रताप की अधीनता स्वीकार करने के लिए एक के बाद एक चार दूत भेजने की पहल की. सितंबर 1572 ई में, महाराणा प्रताप के सिंहासन पर चढ़ने के छह महीने बाद, अकबर ने अपने बहुत ही चतुर और वाक्पटु दरबारी जलाल खान कोच्चि के साथ एक संधि प्रस्ताव रखा, लेकिन बात नहीं बनी उसके अगले वर्ष, अकबर ने प्रताप को वश में करने के लिए फिर से क्रमशः तीन अन्य दरबारियों मानसिंह, भगवंतदास और टोडरमल को भेजा, लेकिन महाराणा प्रताप किसी भी कीमत पर अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए सहमत नहीं हुए.


महाराणा प्रताप के समय मेवाड़ का इतिहास व हल्दीघाटी का युद्ध

मार्च 1576 में मेवाड़ पर आक्रमण की योजना बनाने के लिए अकबर स्वयं अजमेर गया था. उसी समय, मानसिंह को मेवाड़ के खिलाफ भेजे जाने के लिए सेना का कमांडर घोषित किया गया था. 3 अप्रैल, 1576 ई को मानसिंह मेवाड़ को जीतने के लिए अपनी सेना के साथ रवाना हुआ. लगभग दो महीने तक मांडलगढ़ में रहने के बाद, मानसिंह ने अपना सैन्य बल बढ़ाया और खमनौर गाँव के पास पहुँच गया. उस समय मानसिंह के साथ ग़ज़िका बैदख़्शी, ख़्वाजा ग़यासुद्दीन अली, आसिफ ख़ान, सैयद अहमद ख़ान, सैयद हाशिम ख़ान, जगन्नाथ कच्छवाह, सैयद राजू, मेहतर ख़ान, भगवंत दास के भाई माधोसिंह, मुजाहिद बेग आदि थे. 

मुगल इतिहास में जब समय एक हिंदू को इतनी बड़ी सेना के कमांडर के रूप में भेजा गया था. मुगल सेना के 'कमांडर इन चीफ' के रूप में मानसिंह के बनाये जाने से मुस्लिम दरबारियों में रोष फैल गया. बदायुनी ने अपने गुरु नकीब खान को भी इस युद्ध में जाने के लिए कहा, पर मुस्लिम गुरु नकीब खान ने जवाब दिया कि "यदि इस सेना का कमांडर हिंदू नहीं होता, तो मैं पहला व्यक्ति होता जो इस युद्ध में शामिल होता." ग्वालियर के राजा रामशाह और दिग्गज योद्धाओं ने इस युद्ध के बारे में सुझाव दिया कि मुगल सेना के अधिकांश सैनिकों को पहाड़ी हिस्सों में लड़ने का अनुभव नहीं है. 

इसलिए, उन्हें पहाड़ी भाग में घिराकर, नष्ट कर देना चाहिए. लेकिन मुगलों के युवा समूह ने इस राय को चुनौती दी और जोर देकर कहा कि मेवाड़ के बहादुरों को पहाड़ी क्षेत्र से बाहर आना चाहिए और खुले मैदान में दुश्मन सेना को हराना चाहिए. अंत में, मानसिंह ने बनास नदी के किनारे मोलेला में अपना शिविर स्थापित किया और प्रताप ने मानसिंह से छह मील की दूरी पर, हारसिंग गांव में अपना पड़ाव बनाया. सैयद हाशिम का नेतृत्व मुगल सेना में हरवाल (सेना का सबसे बड़ा हिस्सा) ने किया था व उनके साथ मुहम्मद बदख्शी रफी, राजा जगन्नाथ और आसफ खान भी थे.

महाराणा प्रताप की सेना के दो भाग थे, राणा प्रताप की सेना के अगुवा में हकीम खान सूरी, उनके पुत्रों के साथ ग्वालियर के रामशाह, पुरोहित गोपीनाथ, शंकरदास, चरण जैसा, पुरोहित जगन्नाथ, सलूम्बर के चूड़ावत कृष्णदास, सरदारगढ़ के भीमसिंह, देवगढ़ के रावत सांगा, जयमल, मेदतिया का पुत्र रामदास आदि थे. दूसरा भाग में महाराणा प्रताप द्वारा स्वयं सेना के केंद्र में थे, जिनके साथ भामाशाह और उनके भाई ताराचंद थे. 18, जून 1576 को सुबह महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी में गोगुन्दा की ओर जाने वाली सेना से आगे बढ़ने का फैसला किया. 

युद्ध के पहले भाग में मुगल सेना के बल को तोड़ने के लिए, राणा प्रताप ने अपने हाथी लूना को आगे बढ़ाया जिसने मुगलों के हाथी गजमुख (गजमुख) का सामना किया गया था. गजमुख घायल होने के बाद भागने ही वाला था तब लूना के अपने महावत तीर से गजमुख घायल हो गए और लूना वापस लौट आए. इस पर महाराणा के प्रसिद्ध हाथी रामप्रसाद को मैदान में उतारा जाना था. युद्ध प्रताप की मोहरा सेना द्वारा एक भयंकर हमले के साथ शुरू हुआ. मेवाड़ के सैनिकों ने मुगल पक्ष के मोर्चे और वाम पक्ष को अपने तेज हमले और वीरतापूर्ण युद्ध कौशल से विचलित कर दिया. 

बदायुनी के अनुसार, इस हमले के डर से, मुगल सेना लूणकरन के नेतृत्व में भेड़ के झुंड की तरह भाग गई. उस समय महाराणा प्रताप के राजपूत सैनिकों और मुगल सेना के राजपूत सैनिकों के बीच अंतर करना मुश्किल हो गया, तो बदायुनी ने मुगल सेना के दूसरे कमांडर आसफ खान से यह पूछा. आसफ खान ने कहा कि "आप तीर चलाते हैं. अगर राजपूत किसी भी पक्ष से मारा जाता है, तो इस्लाम को इसका फायदा होगा." मानसिंह को मुगल सेना का सेनापति बनाने का बदायुनी भी विरोध कर रही थे, लेकिन जब उसने मानसिंह को बड़ी वीरता से लड़ते देखा और उसने महाराणा प्रताप के खिलाफ युद्ध किया, तो वह बहुत प्रसन्न हुआ.

युद्ध के दौरान, सैयद हाशिम घोड़े से गिर गया व आसफ खान पीछे हट गया और मुगल सेना के मध्य भाग में शरण ली. जगन्नाथ कछवाहा भी मारा जाता है, लेकिन माधोसिंह कछवाहा उसकी मदद करने के लिए चंदावल सेना में पीछे की पंक्ति से एक टुकड़ी के साथ आता है. मुगल सेना के चंदावल में मिहत्तर खान के नेतृत्व में आपातकाल के लिए एक सुरक्षित दल रखा गया था. अपनी सेना को भागता हुआ देखकर, मिहिर खान चिल्लाते हुए आगे आया कहा कि "राजा सलामत है और स्वयं एक बड़ी सेना लेकर आ रहे हैं." इसके बाद, स्थिति बदल गई और भागती मुगल सेना नए सिरे से नए जोश के साथ वापस लौट आई.

महाराणा प्रताप अपने प्रसिद्ध घोड़े चेतक पर लड़ रहे थे और मानसिंह मर्दाना नामक हाथी पर सवार थे. रणछोड़ भट्ट द्वारा संस्कृत ग्रंथ अमरवाक्य में, यह वर्णन किया गया है कि प्रताप ने मानसिंह के हाथी के माथे पर चेतक के आगे के पैरों को तेज किया और अपने भाले से मानसिंह पर हमला किया. लेकिन मानसिंह हौंडों में झुककर खुद को बचाने में सफल रहा, इस दौरान मुगलो का हाथी महावत मार दिया गया. पर मानसिंह के हाथी की सूंड पर तलवार से चेतक का एक पैर कट गया था. महाराणा प्रताप को संकट में देखकर, 

बड़ी सादगी के झाला बीदा ने खुद शाही छत्र धारण करके युद्ध जारी रखा और महाराणा प्रताप युद्ध को पहाड़ों पर ले गए. हल्दीघाटी से कुछ दूरी पर बालीचा नामक स्थान पर घायल चेतक की मृत्यु हो गई, जहाँ उसका मंच अभी भी बना हुआ है. हल्दीघाटी के युद्ध में, महाराजा प्रताप की ओर से वीरता में जय बीदा, मेड़तिया के रामदास पुत्र, रामशाह की और से उनके तीन बेटे (शालिवाहन, भवानी सिंह और प्रतापसिंह) आदि शहीद हो गए. सलूम्बर के रावत कृष्णदास चुडावत, घनराव के गोपालदास, भामाशाह, ताराचंद आदि प्रमुख सरदार थे जो युद्ध के मैदान में बीच गए थे.

जब युद्ध पूरी गति पर था, तो तब महाराणा प्रताप ने युद्ध की स्थिति बदल दी. राणा प्रताप ने युद्ध को पहाड़ों की ओर मोड़ दिया और मानसिंह ने मेवाड़ी सेना का पीछा नहीं किया. मुगलों ने प्रताप की सेना का पीछा क्यों नहीं किया इस संदर्भ में बदायुनी ने तीन कारण बताये थे

  1. जून की चिलचिलाती धूप.
  2. अत्यधिक थकान से लड़ने के लिए मुगल सेना की क्षमता का अभाव.
  3. मुगलों को डर था कि राणा प्रताप पहाड़ों में घात लगाए बैठे थे और उनके अचानक आक्रमण से अत्यधिक सैनिकों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा.

इस प्रकार, अकबर की इच्छा के अनुसार, वह न तो प्रताप को पकड़ सकता था और न ही मार सकता था और न ही मेवाड़ की सैन्य शक्ति को नष्ट कर सकता था. अकबर का सैन्य अभियान विफल हो गया और परिणाम महाराणा प्रताप के पक्ष में था. युद्ध के परिणाम से निराश होकर, अकबर ने मानसिंह और आसफ खान को कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया, जिसका अर्थ है कि उन्हें अदालत में जाने से वंचित कर दिया गया था. शनशाह अकबर की विशाल संसाधन सेना के गौरव को मेवाड़ी सेना ने ध्वस्त कर दिया था.

जब राजस्थान के राजा मुगलों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने और उनका पालन करने के लिए मर रहे थे. उस समय महाराणा प्रताप की स्वतंत्रता का विकल्प निस्संदेह एक सराहनीय कदम था.


महाराणा प्रताप पर अकबर द्वारा चलाए गए अभियान

शाहबाज खान का अभियान - हल्दीघाटी युद्ध के बाद, अकबर ने महाराणा प्रताप को तीन बार पूरी तरह से कुचलने के लिए मिर्बख्शी शाहबाज खान को भेजा. 15 अक्टूबर 1577 को पहली बार शाहबाज खान को मेवाड़ भेजा गया था. पहले आक्रमण के समय, शाहबाज़ खान ने कलवारा गाँव पर अधिकार कर लिया और कुंभलगढ़ को घेर लिया, फिर भी वह इसे लेने में सफल नहीं रहा और कुछ समय बाद महाराणा प्रताप ने अधिकार प्राप्त कर लिया. प्रताप राव, अक्षयराज के पुत्र, भान सोनगरा का किला नियुक्त, अपने सैनिकों के साथ ईडर की ओर निकले और 

चुलिया गाँव में रुके जहां भामाशाह और उनके भाई ताराचंद ने महाराणा प्रताप को पच्चीस लाख रुपये और बीस हजार अशर्फियाँ भेंट कीं. भामाशाह की सैन्य और प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए, प्रताप ने उन्हें राम महाशानी के स्थान पर मेवाड़ का प्रधान मंत्री नियुक्त किया. भामाशाह से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के बाद, प्रताप ने सायना का पुनर्गठन किया और जुलाई 1582 ई में अबर को देखते हुए, देवर (राजसमंद) के पास मुगल पुलिस स्टेशन पर हमला किया. इस स्टेशन को अकबर के चाचा सुल्तान खान ने नियंत्रित किया था. 

अमरसिंह ने संघर्ष के दौरान अपना भाला इतनी ताकत से मारा कि उसने उस घोड़े को भी पार कर दिया, जिससे सुल्तान खान मुगल को भेद दिया. देवर की विजय के बाद, राणा प्रताप ने पर्वतीय भाग पर अधिकार कर लिया. कर्नल टॉड ने दीवर के युद्ध को "मेवाड़ का मेराथन" कहा है.

प्रताप के खिलाफ अंतिम अभियान - अकबर ने 6 दिसंबर 1584 ई को मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए जगन्नाथ कछवाह (आमेर के राजा भारमल के छोटे पुत्र) को भेजा 1585 ई में मेवाड़ में जगन्नाथ कुछ विशेष नहीं कर सके और निराश हुए. जगन्नाथ कछवाह का आक्रमण प्रताप व मेवाड़ पर अंतिम हमला साबित हुआ. अब अकबर का मानना ​​था कि महाराणा प्रताप को पकड़ने की कोशिश करना या उनसे अपनी संप्रभुता स्वीकार करना एक कल्पना मात्र है. उसी समय, अकबर पश्चिमोत्तर समस्या में उलझ गया था. इस कारण से, प्रताप के खिलाफ अभियान हमेशा के लिए बंद कर दिया गया.


महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया की मृत्यु

धनुष को खींचने की कोशिश के दौरान महाराणा प्रताप घायल हो गए और उनकी 57 वर्ष की आयु में 19 जनवरी 1597 ई को मृत्यु हो गई. चावंड से ढाई किलोमीटर दूर बंदोली गाँव के पास एक नाले के किनारे उनका अंतिम दाह संस्कार किया गया. इसके संबंध में दरसा आद्या ने प्रताप के बारे में लिखा है: -

अस लेगो अनादग पग लेगो अन्नामि।

गौ आद गवदै, गयो बहतो धुरवामी ।।

नवरोज नहि गयो, नागौ अत्तन नवल्ली।

नागी झरोखा सेठ, जेठ विशन दाहल्ली।।

जिन्होंने कभी अपने घोड़ों को शाही सेना में नहीं भेजा और उन पर दाग भी नहीं लगा दिया, जिन्होंने किसी के सामने अपनी पगड़ी नहीं झुकाई, जिन्होंने हमेशा दुश्मनों को व्यंग्यात्मक कविताएं सुनाईं, जो बाएं कंधे से पूरे भारत की गाड़ी का वजन खींचने में सक्षम था. जो कभी नौरोज़ में नहीं गया, जो शाही छावनियों में भी नहीं गया, और अकबर का झरोखा, जिसकी दुनिया भर में प्रतिष्ठा थी, उसके अधीन भी नहीं आया. ऐसा गहलोत (महाराणा प्रताप) जीत के साथ मौत के मुंह में चला गया.


वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की सच्ची कहानी 

प्रताप को लगभग 12 वर्षों तक शांति और स्वतंत्रता का उपयोग करने का अवसर मिला. इस अवसर का लाभ उठाते हुए, उन्होंने मेवाड़ के उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व और मध्य भाग में फैले मुगल पुलिस स्टेशनों पर छापा मारना शुरू कर दिया. जल्द ही उन्होंने 36 स्थानों के मुगल पुलिस थाने को उदयपुर, मोही, गोगुन्दा, मंडल, पनारवा, आदि प्रमुख स्थान दिए. उदयपुर के 1588 ई के एक लेख में प्रताप द्वारा जहज़पुर के पास पंढेर की संपत्ति को त्रिवेदी सादुलनाथ को दिए जाने का उल्लेख है.

इससे पता चलता है कि प्रताप ने उस समय तक मेवाड़ के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र को हटा लिया था और अपने विश्वसनीय अनुयायियों को जागीर प्रदान करके पुनर्निर्माण के कार्य में व्यस्त थे. 1585 के बाद उन्होंने अपनी राजधानी चावंड का विकास पूरा किया. उन्होंने ध्यान दिया और यहाँ बने कई महल और मंदिर मिले. जीवधर की कृति 'अमरसर' के अनुसार, प्रताप ने इतना मजबूत शासन स्थापित किया था कि महिलाएँ और बच्चे भी किसी से नहीं डरते थे. आंतरिक सुरक्षा भी इतनी अधिक प्राप्त की गई थी कि बिना अपराध के किसी को कोई सजा नहीं दी गई थी. उन्होंने शिक्षा के प्रसार का भी प्रयास किया.

1588 ई के अंत तक, महाराणा प्रताप ने चित्तौड़, मांडलगढ़ और अजमेर को जोड़ने वाले परस्पर क्षेत्रों के अलावा पूरे मेवाड़ पर अधिकार कर लिया था. जैसा कि मुगल आक्रमण बंद हो गया, तब राणा प्रताप ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक शांतिपूर्वक चावंड में शासन किया था. जहां शांतिकाल में, राजधानी चावंड बढ़ी और यहां कलात्मक इमारतें और मंदिर बनाए गए. जिससे व्यापार, वाणिज्य, कला, साहित्य और संगीत को प्रोत्साहन मिलने लगा. प्रताप के संरक्षण में चावंड में रहते हुए, चक्रपाणि मिश्रा ने तीन संस्कृत ग्रंथ, द कोरोनेशन विधि, मुहूर्तमाला और विश्ववल्लभ लिखा. 

ये ग्रंथ क्रमशः गद्दीनशिनी की शास्त्रीय पद्धति, ज्योतिष और बागवानी के विषयों से संबंधित हैं. 'गोरा बादल कथा पद्मिनी चौपाई काव्य पुस्तक हेमरत्न सूरी ने 1596 ई में भामाशाह के भाई ताराचंद की प्रेरणा से प्रताप के शासनकाल में लिखी थी. चारण कवि राम सांधू और माला संधू प्रताप की सेना के साथ सैनिकों के बीच त्याग और बलिदान की भावना जगाने के लिए रहते थे. राम सांधू ने प्रताप की वीरता की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि 'अकबर उस पक्षी की तरह है, जिसने अनन्त आकाश प्रताप के रोष को खोजने के लिए उड़ान भरी थी, लेकिन वह इससे उबर नहीं पा रहा था. अंत में, उसे अपनी सीमा में ही रहना पड़ा.


महाराणा प्रताप की प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ

1. निहत्थे पर हमला न करें - उन्होंने निहत्थे पर हमला नहीं करने की कसम खाई थी. उनके पास हमेशा दो तलवारें थीं. एक स्वयं के लिए व दूसरी एक दुश्मन को देने के लिए.

2. मेवाड़ का राज चिन्ह सामाजिक समरसता का प्रतीक है. एक तरफ क्षत्रिय और दूसरी तरफ भील योद्धा, सारा समाज समानता का सूचक है. महाराणा प्रताप सभी के प्रिय थे, हर कोई उनके लिए मरने को तैयार था.

3. स्वतंत्रता प्रेमी - महाराणा प्रताप स्वतंत्रता के प्रेमी थे, कई कष्टों के बाद भी, वे किसी भी कीमत पर अकबर की अधीनता को स्वीकार करने के लिए सहमत नहीं थे.

4. धर्म के रक्षक और राज चिन्ह सम्मान - महाराणा प्रताप ने हमेशा धर्म और राजपरिवार की रक्षा की. उनकी धारणा थी कि राखा राखे धर्म तीसरा राखे करतार.

5. शेल-स्ट्री सम्मान - महिला सम्मान के लिए भारतीय परंपरा का एक उदाहरण प्रस्तुत किया. 1560 ई में, जब कुंवर अमरसिंह ने शेरपुर के मुगल शिविर पर अचानक हमला किया, तो सूबेदार अब्दुर्रहीम खानखाना के परिवार को बंदी बना लिया गया तब महाराणा प्रताप ने खानखाना की महिलाओं और बच्चों को उचित सम्मान और सुरक्षित वापसी के आदेश दिए.

6. प्रेरणा पुरुष- महाराणा प्रताप के बाद में शिवाजी छत्रसाल से ब्रिटिश के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम में स्वतंत्रता सेनानियों की प्रेरणा बने.

7. महाराणा प्रताप की शानदार सहयोगी व प्रतिभा का कारण था जिसकी वजह से भामाशाह ने अपना सारा धन महाराणा के चरणों में समर्पित कर दिया.


महाराणा प्रताप का इतिहास व जीवनी से जुड़े सवाल - Maharana Pratap History & Biography FAQ in Hindi

Q.1 महाराणा प्रताप कौन थे?

Ans. महाराणा प्रताप मेवाड़ के व सिसोदिया राजपूत राजवंश के शासक थे.

Q.2 महाराणा प्रताप का जन्म कब हुआ था?

Ans. 9 मई 1540ई में.

Q.3 महाराणा प्रताप का जन्म कहाँ हुआ था?

Ans. मेवाड़ के कुम्भलगढ में.

Q.4 महाराणा के माता-पिता का नाम क्या था? 

Ans. महाराणा उदयसिंह और महाराणी जयवन्ताबाई.

Q.5 महाराणा प्रताप का पूरा नाम क्या था?

Ans. महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया.

Q.6 महाराणा प्रताप की ऊंचाई कितनी थी?

Ans. 7 फीट 5 इंच.

Q.7 महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक कब और कहाँ हुआ था?

Ans. 28 फरवरी, 1572ई में, गोगुन्दा में

Q.8 महाराणा प्रताप की तलवार कितने किलो की थी?

Ans. 25 किलोग्राम.

Q.9 महाराणा प्रताप के कितने भाई थे?

Ans. जगमाल सिंह, सागर सिंह, मीर शक्ति सिंह और कुँवर विक्रमदेव.

Q.10 महाराणा प्रताप की कितनी पत्नियां थी?

Ans. महाराणा प्रताप की  11 पत्नियाँ थी.

Q.11 महाराणा प्रताप की शादी कब हुई थी?

Ans. 1557 ई में.

Q.12 महाराणा प्रताप के कितने पुत्र थे?

Ans. 17 पुत्र.

Q.13 महाराणा प्रताप की पत्नी अजबदे की मृत्यु कैसे हुई?

Ans. हल्दीघाटी के युद्ध में चोट लगने के वजह से.

Q.14 महाराणा प्रताप हल्दीघाटी का युद्ध कब हुआ था?

Ans. 18 जून 1576ई को.

Q.15 महाराणा प्रताप का वजन कितना था?

Ans. 115 किलोग्राम

Q.16 महाराणा प्रताप को किसने मारा था?

Ans. महाराणा प्रताप को किसी ने नहीं मारा था वे धनुष खींचने से घायल हुए थे जिसके कारण उनका देहांत हो गया.

Q.17 महाराणा प्रताप की मृत्यु कैसे हुई थी?

Ans. धनुष को खींचने की कोशिश के दौरान घायल होनी की वजह से.

Q.18 महाराणा प्रताप की मृत्यु कब हुई थी?

Ans. 19 जनवरी 1597 को.

Q.19 हल्दीघाटी का युद्ध कब और किसके बीच लड़ा गया था?

Ans. 18 जून 1576 को महाराणा प्रताप और अकबर के प्रमुख सेनानायक मानसिंह के बीच.

Q.20 हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह के सेनापति कौन थे?

Ans. हकीम खान सूर.

Q.21 महाराणा प्रताप का भाला कहाँ रखा है?

Ans. राजस्थान, उदयपुर शहर के सिटी पैलेस में.

Q.22 महाराणा प्रताप के घोड़े का नाम क्या था?

Ans. चेतक.

Q.23 महाराणा प्रताप जयंती कब मनाई जाती है?

Ans. 9 मई को.


दोस्तों मैं उम्मीद और आशा करता हूँ कि आपको आज का यह लेख महाराणा प्रताप का इतिहास व जीवन परिचय - Maharana Pratap History & Biography in Hindi अच्छा लगा होगा यदि आपको यह लेख पसंद आये तो अपने दोस्तों में जरूर शेयर करना क्योंकि हम आपके लिए हर रोज ऐसी ही ऐतिहासिक और जीवन परिचय से जुड़ी जानकारी लाते रहते है.


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