पृथ्वीराज चौहान का इतिहास और जीवन परिचय - Prithviraj Raj Chauhan History and biography in Hindi

पृथ्वीराज चौहान का इतिहास और जीवन परिचय हिंदी में - नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका आज की इस इतिहास और जीवन परिचय की रोचक जानकारी में, दोस्तों आज हम यहाँ आपको इस पृष्ठ पर History & Biography of Prithviraj Raj Chauhan in Hindi पृथ्वीराज चौहान का इतिहास और जीवन परिचय बता रहे है. यदि आप पृथ्वीराज चौहान का जीवन परिचय और इतिहास जानना चाहते हैं तो आप हमारे साथ अंत तक बनें रहिए क्योंकि दोस्तों आज हम पृथ्वीराज चौहान का संपूर्ण जीवन वृतांत, इतिहास और उनकी अमर कथा जानने वाले हैं तो चलीए आगे बढ़ते है और शुरू करते है.

पृथ्वीराज चौहान का इतिहास और जीवन परिचय - Prithviraj Raj Chauhan History and biography in Hindi
Prithviraj Raj Chauhan History and biography


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पृथ्वीराज चौहान का जीवन परिचय

Name - पृथ्वीराज चौहान

Other Names - भरतेश्वर,राय पिथौरा, पृथ्वीराज तृतीय, सपादलक्षेश्वर, हिन्दूसम्राट

Janm - 1 जून, 1163

Janm Sthan - पाटण, गुजरात, भारत

Mata,Pita - सोमेश्वर और कर्पूरदेवी

Desh - भारत 

Dharm - हिन्दू 

Mratyu - 11 मार्च, 1192 अजमेर, राजस्थान


Prithviraj Raj Chauhan Biography in Hindi - वीर योद्धा पृथ्वीराज चौहान का जन्म सन 1 जून, 1163 को गुजरात में पाटण नामक क्षेत्र में हुआ था. पृथ्वीराज चौहान के पिताजी का नाम सोमेश्वर था एवं माताजी का नाम कर्पूरादेवी चौहान था. पृथ्वीराज चौहान के भाई का नाम हरिराज था. दोनों भाइयों का जन्म गुजरात में ही हुआ था. पृथ्वीराज चौहान का पालन पोषण राजा सोमेश्वर के रिश्तेदारों के यहाँ चालुक्यों में हुआ था. पृथ्वीराज चौहान के बचपन के मित्र चंदबरदाई थे. जो बाद में उनके दरबारी कवि हुए थे. पृथ्वीराज चौहान मूल रूप से हिन्दू धर्म के व्यक्ति थे. कहा जाता है कि वे चौहान वंश के राजवंश थे.


पृथ्वीराज चौहान का इतिहास - Prithviraj Raj Chauhan History in Hindi

भारत में मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय दिल्ली और  अजमेर पर पृथ्वीराज चौहान तृतीय का शासनकाल था जो ऐतिहासिक तथ्यों में 'रायपिथौरा' के नाम से प्रसिद्ध है. पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1163 ई. में हुआ था. वे अपने पिता सोमेश्वर के देहावसान के बाद मात्र 11 वर्ष की उम्र में ही चौहान साम्राज्य का उत्तराधिकारी बनें थे. पृथ्वीराज चौहान की माता कर्पूरदेवी मुख्य रूप से एक कुशल और राजनीतिज्ञा स्त्री थी इस वजह से कर्पूरदेवी ने अपने प्रधानमंत्री कदम्बवास और प्रमुख सेनापति भुवनमल्ल की सहायता से राज्य का शासन बहुत ही आसानी और सरलता से संभाल लिया था.

लगभग एक वर्ष तक इसी प्रकार राज्य माता कर्पूरदेवी के संरक्षण में रहने के बाद 1178 ई. में पृथ्वीराज चौहान ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ली तथा शीघ्र ही उन्होंने उच्च पदों पर अपने विश्वसनीय अधिकारियों की नियुक्ति कर विजय नीति को क्रियान्वित करने का बीड़ा उठाया. इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा के अनुसार इस विजय नीति के कुल तीन पक्ष थे स्वजनों के विरोध से मुक्ति पाना, पड़ोसी राज्यों का दमन तथा विदेशी शत्रुओं का मुकाबला.


पृथ्वीराज चौहान की विजय -  पृथ्वीराज को अल्पव्यस्क देख कर उसके चाचा अपरगांग्य ने स्वयं शासक बनने के लालच में पृथ्वी राज चौहान पर विद्रोह कर दिया. जिसमें पृथ्वीराज चौहान ने उसे परास्त कर उसकी हत्या कर डाली किन्तु विरोधी दल शांत नहीं हुआ. अपरगांग्य के छोटे भाई नागार्जुन ने विद्रोह का बिगुल बजाते हुए गुरुग्राम (गुडगांव) पर अपना अधिकार कर लिया. यह जानकर पृथ्वीराज द्वारा सेना भेजने पर नागार्जुन गुरुग्राम (गुड़गांव) छोडकर भाग गया और उसके सेनापति देवभट्ट ने कुछ समय तक गुरूग्राम (गुडगांव) को बचाने का प्रयास अवश्य किया किन्तु पृथ्वीराज की सेना इस संघर्ष में सफल रही. 

इस विद्रोह में विद्रोहियों को मौत घाट उतार दिया गया और उनके सिर नगर की प्राचीरों पर लटका दिये गये जिससे कि भविष्य में कभी भी अन्य शत्रु उनसे विरोध करने का साहस न कर सकें. सन 1182 ई. के आसपास पृथ्वीराज चौहान ने गुडगांव व हिसार के आसपास बसी हुई भण्डानक नामक उपद्रवी जाति को पराजित किया और अपने राज्य की उत्तरी सीमा को सुरक्षित कर उसका विस्तार किया. इस संदर्भ में समसामयिक लेखक जिनपति सूरि ने पृथ्वीराज द्वारा भण्डानकों दमन का विस्तृत उल्लेख किया है. शुरुआती सफलताओं के बाद पृथ्वीराज चौहान ने प्राचीन भारतीय शासकों के समान ही दिग्विजय नीति अपनाने का फैसला किया. 

इस भण्डानकों के दमन के बाद उनकी सीमाएँ चन्देलों के महोबा राज्य से मिलने लग गई थी. अपने कुछ सैनिकों की हत्या का बदला लेने के लिए पृथ्वीराज चौहान ने 1182 ई. में महोबा राज्य पर आक्रमण कर दिया. इस युद्ध में चंदेल शासक परमर्दीदेव के दो सेनापति आल्हा व ऊदल लड़ते हुए मारे गए. विजयी पृथ्वीराज चौहान पंजुनराय को महोबा का अधिकारी नियुक्त कर लौट आये. पृथ्वीराज रासो केेे अंतर्गत पृथ्वीराज चौहान ने आबू नामक स्थान की राजकुमारी इच्छिनी से विवाह कर गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय को अप्रसन्न कर दिया क्योंकि भीमदेव भी इच्छिनी के संग विवाह के इच्छुक थे. 

डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार दोनों शासकों के बीच संघर्ष का वास्तविक कारण उनके राज्यों की सीमाएँ मिलना और दोनों शासकों की महत्त्वाकांक्षायें थी. दोनों शासकों के बीच छोटी-मोटी झड़पों के बाद जगदेव प्रतिहार की मध्यस्थता से संधि हो गई किन्तु इस संधि से परम्परागत वैमनस्य समाप्त नहीं हुआ और चौहान चालुक्य के बीच द्वेष भीतर ही भीतर सुलगता रहा. पृथ्वीराज के पूर्वी दिशा में स्थित कन्नौज के गहड़वाल राज्य का शासक उस समय जयचन्द्र था. दिल्ली के साथ नियन्त्रण को लेकर, चौहानों तथा गहड़वालों के बीच परम्परागत वैमनस्य चल रहा था. 

पृथ्वीराज चौहान दिग्विजय योजना को पूर्णता रूप से प्रदान करने के लिए कन्नौज को अपने राज्य के साथ मिलाना चाहते थे, वहीं दूसरी ओर जयचन्द्र भी उसकी होड़ में विजय बनने की योजनाएँ बना रहा था. इस कारण दोनों के बीच संघर्ष, होना संभवतः तय था. पृथ्वीराज चौहान के द्वारा जयचन्द्र की पुत्री (बेटी) संयोगिता का बलपूर्वक अपहरण करके विवाह किया जाना दोनों शासकों के मध्य संघर्ष का चरमोत्कर्ष था. अपनी बेटी के अपहरण से राजा जयचन्द्र पृथ्वीराज चौहान का कड़ा शत्रु बन गया और पृथ्वीराज से बदला लेने का अवसर ढूंढने लगा. एक प्रचलित मत के अनुसार उसने सहायता का आश्वासन देकर मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया था. 

पुरातन प्रबन्ध संग्रह के अनुसार गौरी के हाथों पृथ्वीराज की पराजय की खबर सुनकर जयचन्द्र ने अपनी राजधानी में खुशियाँ मनाई थी.


पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की प्रेम कहानी - रानी संयोगिता और पृथ्वीराज चौहान की प्रेम कहानी इतिहास में सबसे विचित्र और अविस्मरणीय मानी जाती है. क्योंकि वे दोनों सिर्फ एक दूसरे की छवि में ही प्यार कर बैठे थे. एक तरफ दोनों प्यार में मोहित थे वही दूसरी और पृथ्वीराज चौहान के लिए यह एक बड़ा खतरा था. क्योंकि रानी  संयोगिता राजा जयचन्द्र की पुत्री थी. राजा जयचन्द्र और पृथ्वीराज चौहान के आपसी मामले उलझे हुए थे दोनों राजा एक दूसरे के शत्रु थे. ऐसे में उन दोनों के बीच संघर्ष होना तय था.

चंदबरदाई की रचना पृथ्वीराज रासो' के अनुसार जयचन्द्र और पृथ्वीराज चौहान के बीच संघर्ष का कारण पृथ्वीराज चौहान द्वारा जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता का अपहरण कर उसके साथ विवाह करना था. कथानक के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता के बीच प्रेम था किन्तु जयचन्द्र पृथ्वीराज के साथ शत्रुतापूर्ण सम्बन्धों के चलते अपनी पुत्री संयोगिता का विवाह किसी अन्य राजा के साथ करना चाहता था. इस उद्देश्य से उसने राजसूय यज्ञ के साथ संयोगिता के स्वयंवर का आयोजन किया. 

इस आयोजन में उसने पृथ्वीराज को छोड़कर सभी प्रमुख राजा-महाराजाओं को आमन्त्रित किया. इतना ही नहीं जयचन्द्र ने पृथ्वीराज चौहान को अपमानित करने के लिए उसकी मूर्ति बनवाकर द्वारपाल के स्थान पर लगवा दी. स्वयंवर के समय जब सभी राजा-महाराजा संयोगिता की वरमाला का इन्तजार कर रहे थे उस समय संयोगिता ने पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति के गले में वरमाला डाल दी. उसी वक्त पृथ्वीराज चौहान अपनी सेना संहित घटनास्थल पर पहुँचे और संयोगिता को उठाकर ले गये. 

जयचन्द्र के सैनिकों द्वारा पृथ्वीराज चौहान को रोकने का प्रयास किया किन्तु वे सब असफल रहे. डॉ. आर. एस. त्रिपाठी, गौरीशंकर, हीराचन्द और विश्वेश्वरनाथ रेऊ जैसे इतिहासकारी ने इसकी ऐतिहासिकता को मात्र प्रेमाख्यान कहकर अस्वीकार कर दिया है जबकि डॉ. दशरथ शर्मा ने 'दि अली चौहान डाइनेस्टीज' में संयोगिता की घटना के ऐतिहासिक तथ्यों को स्वीकार किया है.


पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच संघर्ष - गजनी का गवर्नर नियुक्त होने के बाद मुहम्मद गौरी ने 1175 ई. में मुल्तान पर हमला करके अपना अधिकार कर लिया. इसके बाद उसने गुजरात, सियालकोट और लाहौर के युद्धों में विजय हासिल कर अन्य शासकों को अपनी शक्ति का परिचय दिया. राजस्थानी स्रोतों के अनुसार इस दौरान उसकी पृथ्वीराज चौहान के साथ अनेक बार लडाइयाँ हुई और हर बार उसे पराजय का सामना ही करना पड़ा था. पृथ्वीराज रासो में 21 तथा हम्मीर महाकाव्य में सात बार मुहम्मद गौरी पर पृथ्वीराज चौहान की विजयों का दावा किया गया है. दोनों के बीच दो निर्णायक युद्ध हुए थे. 

1191 ई. में लाहौर से रवाना होते हुए मुहम्मद गौरी ने तबरहिन्द नामक स्थान पर अधिकार कर लिया और वह वहां से तराइन तक पहुँच गया. यहाँ दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें पृथ्वीराज चौहान के नेतृत्व में दिल्ली के सामंत गोविन्दराज ने अपनी बर्छी के वार से मुहम्मद गौरी को घायल कर दिया. घायल मुहम्मद गौरी अपनी सेना सहित गजनी भाग गया. उसके बाद पृथ्वीराज चौहान ने तबरहिन्द नामक स्थान पर कब्जा कर काजी जियाउद्दीन को बंदी बना दिया जिसे बाद में एक बड़ी धनराशि के बदले रिहा कर दिया गया. एक वर्ष तक ऐसे ही चलता रहा उसके बाद मुहम्मद गौरी अपनी सेना को साथ लेकर वापस तराइन के मैदान में आ धमका. 

यह सुनकर पृथ्वीराज चौहान उसका मुकाबला करने पहुँच गये किन्तु मुहम्मद गौरी ने इस बार अपने शत्रु को संधि वार्ता के झांसे में फसा लिया. कई दिनों तक संधि वार्ता चलने के कारण चौहान सेना निश्चित होकर आमोद-प्रमोद में डूब गई. इसका फायदा उठाकर मुहम्मद गौरी ने एक रात्रि अचानक पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण कर दिया. राजपूत सेना इस बार अप्रत्याशित आक्रमण को झेल नहीं पाई और पराजित हुई. पराजित पृथ्वीराज चौहान को सिरसा के पास सरस्वती नामक स्थान पर मुहम्मद गौरी द्वारा बंदी बना लिया गया. 

पृथ्वीराज रासो के अनुसार बंदी पृथ्वीराज चौहान को मुहम्मद गौरी अपने साथ गजनी ले गया और पृथ्वीराज चौहान को अंधा कर दिया. जहाँ शब्द भेदी बाण प्रदर्शन के जरिए पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी को मार डाला. जबकि समकालीन इतिहासकार हसन निजामी के अनुसार तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी के अधीनस्थ शासक के रूप में अजमेर पर शासन किया था. इसानी के कथन के पक्ष में एक सिक्के का भी संदर्भ दिया जाता है जिसके एक तरफ मुहम्मद बिन और दूसरी तरफ पृथ्वीराज नाम अंकित है.


पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी की मृत्यु - पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु सन 11 मार्च, 1192 में हुई थी. ऐसे दावा है कि मोहम्मद गौरी ने अपने हार का बदला लेने के लिए पृथ्वीराज चौहान को संधि का प्रस्ताव दिया और धोखे से पृथ्वीराज चौहान को अपने कब्जे में लेकर बंदी बना दिया था. बंदी बनाकर मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान की आंखे फोड़ दी और उन्हें अंधा बना दिया. यह जानकर पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि व बचपन के मित्र कवि चंदबरदाई तुरंत ही पृथ्वीराज चौहान के पास ग़ज़नी आए जहां उन्हें भी पृथ्वीराज चौहान के साथ बंदी बना दिया गया.

मोहम्मद गौरी दोनों शासकों को मारने की घोषणा कर चुका था यह जानकर पृथ्वीराज चौहान और उनके मित्र चंदबरदाई ने योजना एक बनाई जिसमें उन्होंने शब्द भेदी बाण प्रदर्शन की योजना बनाई थी. चंदबरदाई ने मुहम्मद गौरी को आवाज दी जैसे ही पृथ्वीराज चौहान ने गौरी की आवाज सुनी तो पृथ्वीराज चौहान ने ठीक उसी दिशा में अपना भाण चलाया जहां मोहम्मद गौरी बैठा था. बाण मोहम्मद गौरी को लगते ही उसकी मृत्यु हो गई फिर बाद में पृथ्वीराज चौहान और उनके दरबारी कवि चंदबरदाई दोनों आपस में एक दूसरे पर वार करके आत्मसमर्पित गए. इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान ने अपने बुद्धि और पराक्रमी शक्ती से मुहम्मद गौरी का वध किया.


पृथ्वीराज चौहान की पराजय के कारण - विजेता होने के बावजूद भी पृथ्वीराज चौहान में दूरदर्शिता व कूटनीति का अभाव था. उन्होंने अपने पड़ोसी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्व सम्बन्ध स्थापित नहीं किये अपितु उनके साथ युद्ध करके शत्रुता मोल ले ली इसी कारण मुहम्मद गौरी के विरुद्ध संघर्ष में उन्हें उनका कोई सहयोग नहीं मिला. सन 1178 ई. में जब मुहम्मद गौरी ने गुजरात के शासक भीमदेव द्वितीय पर आक्रमण किया था, उस समय पृथ्वीराज चौहान ने गुजरात की कोई सहायता न कर एक बड़ी भूल की थी 

इसके बाद तराइन के प्रथम युद्ध में पराजित होकर भागती तुर्क सेना पर आक्रमण न करना भी उनकी एक भयंकर भूल सिद्ध हुई जो पृथ्वीराज चौहान के पराजय होने के प्रमुख कारण थे. यदि उस समय पृथ्वीराज चौहान शत्रु सेना पर प्रबल आक्रमण करते तो मुहम्मद गौरी भारत पर पुनः आक्रमण करने के बारे में कभी नहीं सोचता. संयोगिता के साथ विवाह करने के बाद पृथ्वीराज चौहान ने राजकार्यों की उपेक्षा कर अपना जीवन विलासिता में व्यतीत करना प्रारम्भ कर दिया था. यही कारण थे जिसकी वजह से पृथ्वीराज चौहान मुहम्मद गौरी से युद्ध में पराजित हुए.


पृथ्वीराज चौहान का ऐतिहासिक सच और मूल्यांकन - पृथ्वीराज चौहान एक वीर और साहसी शासक थे. अपने शासनकाल के प्रारम्भ से ही वह युद्ध करते रहे जो उन्हें एक अच्छे सैनिक और सेनाध्यक्ष होने को प्रमाणित करता है. अनेक युद्धों में सफलता प्राप्त कर उन्होंने 'दलपंगुल (विश्वविजेता) की उपाधि धारण की थी. तराइन के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद गौरी द्वारा चल-कापट का सहारा लेने से पूर्व पृथ्वीराज चौहान किसी भी लडाई में नहीं हारे नहीं थे. 

पृथ्वीराज चौहान एक विजेता के साथ-साथ विद्यानुरागी भी थे. क्योंकि उनके दरबार में अनेक विद्वान रहते थे जिनमें विद्यापति गौड़, वाणीश्वर, जनार्दन, जयानक विश्वरूप, आशाधर आदि प्रमुख विद्यानुरागी शामिल थे. चन्दरबरदाई उनके राजकवि थे. चन्दरबरदाई का ग्रंथ 'पृथ्वीराज रासो' हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाय माना जाता है.


Prithviraj Raj Chauhan History and biography FAQ in Hindi

Q.1 पृथ्वीराज चौहान कौन थे?

Ans. पृथ्वीराज तृतीय के शासनकाल 1178–1192 के राजा पृथ्वीराज चौहान थे जो पृथ्वीराज तृतीय थे.

Q.2 पृथ्वीराज चौहान का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

Ans. सन 1 जून, 1163 को पाटण, गुजरात, भारत में.

Q.3 पृथ्वीराज चौहान के माता-पिता का नाम क्या था?

Ans. सोमेश्वर चौहान और कर्पूरादेवी चौहान

Q.4 पृथ्वीराज चौहान कहाँ के शासक थे?

Ans. उत्तर-पश्चिमी भारत में पारम्परिक चौहान क्षेत्र के राजा

Q.5 पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु कैसे हुई थी?

Ans. पृथ्वीराज चौहान और उनके दरबारी कवि चंदबरदाई द्वारा आपस में.

Q.6 पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को कैसे मारा था?

Ans. शब्द भेदी बाण प्रदर्शन की योजना से.

Q.7 पृथ्वीराज चौहान के वंशज कौन है?

Ans. नकुल चौहान

Q.8 पृथ्वीराज चौहान की कितनी रानी थी?

Ans. तेरह रानियां

Q.9 पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच कितने युद्ध हुए थे?

Ans. पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच 18 बार युद्ध हुए थे.

Q.10 पृथ्वीराज चौहान को अन्य किन किन नामों से जाना जाता है?

Ans. राय पिथौरा, भरतेश्वर, हिन्दूसम्राट, पृथ्वीराज तृतीय और सपादलक्षेश्वर आदि.


मैं उम्मीद और आशा करता हूँ कि आपको आज का यह लेख Prithviraj Raj Chauhan History and biography in Hindi पृथ्वीराज चौहान का इतिहास और जीवन परिचय अच्छा लगा होगा यदि आपको यह लेख पसंद आये तो अपने दोस्तों में जरूर शेयर करना क्योंकि हम आपके लिए हर रोज ऐसी ही ऐतिहासिक और जीवन परिचय से जुड़ी जानकारी लाते रहते है.


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